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सिंधु जल संधि : पीएम मोदी ने कहा-खून और पानी साथ-साथ नहीं बह सकते

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सिंध जल संधि पर कड़ा रुख अख्तियार करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को कहा कि खून और पानी साथ-साथ नहीं बह सकते। पीटीआई ने सूत्रों के हवाले से बताया कि बैठक में यह बात उभरी कि संधि के मुताबिक भारत, पाक नियंत्रित सिंधु, चेनाब और झेलम नदियों की अधिकतम क्षमता का दोहन करेगा।

सिंधु जल संधि को लेकर हुई बैठक में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, विदेश सचिव, जल संसाधन सचिव और प्रधानमंत्री कार्यालय के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद।

वरिष्ठ सरकारी सूत्रों ने बताया कि भारत और पाकिस्तान में बढ़े हुए तनाव के बीच हुई बैठक में तात्कालिकता की भावना के साथ संधि के ब्योरे और क्रियान्वयन पर विचार करने के लिए एक अंतर मंत्रालयी कार्य बल गठित करने का भी फैसला किया गया।

बैठक में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल, विदेश सचिव एस जयशंकर, जल संसाधन सचिव एवं प्रधानमंत्री कार्यालय के अन्य अधिकारी उपस्थित थे। इसमें यह जिक्र भी किया गया है कि सिंधु जल आयोग की बैठक सिर्फ आतंक मुक्त माहौल में ही हो सकती है। आयोग की अब तक 112 बैठकें हुई हैं।

सूत्रों ने बताया, ССबैठक में प्रधानमंत्री मोदी का संदेश था कि रक्त और पानी एक साथ नहीं बह सकता।ТТ पनबिजली, सिंचाई और जल संचय के क्षेत्र में पाकिस्तान के नियंत्रण वाली तीन नदियों..सिंधु, चेनाब और झेलम की क्षमता का अधिकतम दोहन करने का फैसला करने के अलावा बैठक में इस बात पर भी सहमति बनी कि 1987 की तुलबुल नौवहन परियोजना को एक पक्षीय तरीके से स्थगित किये जाने की भी समीक्षा हो। यह परियोजना 2007 से स्थगित है।

आधिकारिक सूत्रों ने यह भी बताया कि यदि पाकिस्तान सीमा पार से आतंकवाद का समर्थन करना जारी रखता है और भारत की चिंताओं को दूर नहीं करता है तो सरकार Сऔर भी कदमТ उठा सकती है।

सूत्रों ने बताया कि सिंचाई के लिए जल संसाधनों की उपलब्धता को अधिकतम करने का फैसला जम्मू कश्मीर के लोगांे की पहले से मौजूद भावना के अनुकूल होगा जिन्होंने अतीत में शिकायत की है कि यह संधि उनके लिए निष्पक्ष नहीं है।

उरी हमले में 18 सैनिकों के शहीद होने के बाद पाकिस्तान पर पलटवार करने के भारत के पास उपलब्ध विकल्पों की तलाश करने के मद्देनजर यह बैठक हुई। हमले के बाद यह मांग की जाने लगी है कि सरकार पाकिस्तान पर दबाव बनाने के लिए जल बंटवारा समझौते को रद्द कर दे।

समझौते के तहत व्यास, रावी, सतलुज, चेनाब और झेलम के पानी का दोनों देशों में बंटवारा होना था। इस संधि पर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने सितंबर 1960 में हस्ताक्षर किए थे।

गौरतलब है कि पाकिस्तान पर्याप्त पानी नहीं मिलने की शिकायत करता रहा है और कुछ मामलों में अंतरराष्ट्रीय पंचाट के पास गया है। 


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